IAS अधिकारी तुकाराम मुंडे ने ब्यूरोक्रेसी की पुरानी छवि को चुनौती देते हुए कहा है कि देश को अब ‘बाबूशाही’ नहीं, बल्कि ‘जनहित के देवदूतों’ की ज़रूरत है। उन्होंने ज़ोर दिया कि एक सिविल सर्वेंट की असली पहचान उसके पद या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके काम, संवैधानिक ज़िम्मेदारियों और जनता के प्रति जवाबदेही से होनी चाहिए। मुंडे ने ‘इंडिया एट 100’ इवेंट में बताया कि आने वाले भारत के लिए नौकरशाही के एक नए टेम्पलेट की आवश्यकता है, जिसमें संविधान के मूल्य, सेवा भावना, नवाचार और पारदर्शिता सबसे ऊपर हों। वे स्वयं को ‘बाबू’ या केवल ‘ब्यूरोक्रेट’ कहलवाना पसंद नहीं करते और मानते हैं कि वे एक ‘पब्लिक सर्वेंट’ हैं, जिसकी पहली ज़िम्मेदारी जनता और संविधान के प्रति है।
बाबू’गिरी नहीं, ‘देवदूत’ बनो: तुकाराम मुंडे की नई ब्यूरोक्रेसी की सीख,,,,
